आज से पितृ पक्ष शुरू, श्राद्धों में करें पितरों का सम्मान

 पितर का मतलब आपके पूर्वज और श्राद्ध का मतलब श्रद्धा। अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक सम्मान करना ही श्राद्ध होता है । हिन्दू धर्म की मान्यता है कि मनुष्य के मरने के बाद उसकी आत्मा भटकती रहती है । उस आत्मा को तृप्त करने के लिए तर्पण किया जाता है ।

यहां तक माना जाता है कि यदि हमारे पितृ खुश हो तो हमारे जीवन में खुशहाली होती है और यदि हमारे पितृ खुश न हो अथवा नाराज हो तो घोर पितृकोप लगता है और परिवार में दुःख ,क्लेश आदि होता है ।

आज 13 सितम्बर से शुरू हो गए हैं श्राद्ध ।  इन महत्वपूर्ण दिनों में पितरों को खुश करने के लिए इन्हें जौं तथा चाबल का पिंड दिया जाता है । क्यूंकि माना जाता है कि पितृ पक्ष में हमारे पितृ कौए के रूप में आते हैं और पिंड लेकर चले जाते है। इसके अतिरिक्त पंडित पितरों को खुश करने की विभिन्न बिधियाँ  बताते हैं जैसे ब्राह्मणों को भोजन कराना तथा गाये,कोए,कुत्ते, बिली आदि को रोटी देना ।

श्राद्ध, पूजा, महत्व, श्राद्ध की महिमा एवं विधि का वर्णन विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में यथास्थान किया गया है। श्राद्ध का अर्थ अपने देवों, परिवार, वंश परंपरा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना है। 

श्राद्धों के वक्त आपके पूर्वज किसी भी तरह घर आ सकते हैं तो किसी भी आने वाले को घर से बाहर न भगाएं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया  कि पितृ पक्ष में पशु पक्षियों को  पानी और दाना दे । पितृ पक्ष के दौरान मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। तर्पण में काले तिल और जो तथा दूध का का प्रोयग करें ।

पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। इस अवधि में भूलकर भी कुत्ते, बिल्ली, और गाय को भगाना या हानि नहीं पहुंचानी चाहिए | पितृ पक्ष के सोलह श्राद्ध होते है और प्र्तेक दिन का विशेष महत्व रहता है ।  सबसे अंतिम श्राद्ध सर्वपितृ श्राद्ध होता है।

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